Thursday, January 1, 2015

नन्हा बालक

२७ जून २०१४

नन्हे पैरों ने कब दौड़ना सीख लिया
पता ही नहीं चला
नन्ही जुबां ने कब फ़र्राटे से
बोलना शुरू किया
ठीक से याद भी नहीं
वक़्त की रफ़्तार तो वही होती है
बस हम ही उसे कभी धीमा
कभी तेज़ कर देते हैं
गुमसुम सा आभास देने वाला बालक
कब अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर प्रसिद्धि पा गया
पता ही नहीं चला
वक़्त की रफ़्तार तो वही होती है
बस हम ही उसे कभी धीमा
कभी तेज़ कर देते हैं...

अच्छे दिन

२३ जून २०१४

भीषण गरमी का हाहाकार
पटरी से उतरती जिन्दगियां
दस्तक देते काले घने बादल
शंकित मन
क्या कुछ बदलेगा आज, अभी
या हवा इन्हें उड़ा ले जायेगी और
अपेक्षित पथरायी आँखे जस की तस
इंतज़ार करती रहेंगी उन
अच्छे  दिनों का..

तन्हाई

२२ जून २०१४

संगीत का कोई जलसा था या
घूमने फिरने की तमन्ना
जो ले गयी तीन समन्दर पार
कितने दूर पर कितने पास
कितने पास पर कितने दूर
यह तन्हाई है या मन का भ्रम
सब कुछ तो यहीं है सब कुछ तो वही है
सोच रहा हूँ कि मन को उदास कर लूं
चाँद लम्हों के लिए
पर ये मन है की उन्हें दूर मानता ही नहीं 

दिल्ली की सड़कें

१७ जून २०१४

कारों का कारवाँ था या कारों की भीड़
जो भी हो, सब की कोशिश रही कि
आप उसमें शामिल ना हों
पर बुलंदियों की फ़तह हुई
कारवाँ बढ़ता गया और
मंजिलें और दूर होती रही
क्या ज़िन्दगी सड़क का
पर्यायवाची शब्द है ..

फ़ुटबॉल

१५ जून २०१४

उनींदी उत्सुक आँखे
बढ़ता ख़ुमार
भागते कलाबाज़ी दिखाते खिलाड़ी
उनसे भी तेज़ भागते रेफ़री
हज़ारों दर्शक, करोड़ों और
सबका जूनून एक/ गोल एक
Goal भी एक..
आशाएं आकांक्षाएं
आंसू एक, एक ख़ुशी झलकाता एक निराशा
सबको एक सूत्र में पिरोंता, फूटबाल
बिना जूनून की ये कैसी ज़िन्दगीजोश है तो जहान है


जोधपुर

४ जून २०१४

सुनहरा पत्थर
सुनहरी रेत
नीला शहर
जर्जरित किले 
खूबसूरत रंग बिरंगे लोग
चिलचिलाती शरीरभेदी धूप
भागते वाहन, कुछ इधर, कुछ उधर
महानगरों से छोटा और छोटे नगरों से बड़ा
एक प्यारा सा नगर .. जोधपुर 

विरोधाभास

२६ मई २०१४

वो अमलतास के पीत फूलों से सटी राहें
वो गुलमोहर के केसरिया फूलों से पटे पेड़
वो वैशाख में झमझम गिरती बारिश
और मिटटी से उठती सौंधी खुशबू
हमें विरोधाभास में जीने की आदत सी हो गयी है